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Wednesday, May 11, 2011

I owe it all to them...

हमारे अम्मा और पापा, जिन्होने हमारे लिए अपनी सारी खुशियाँ कुर्बान कर दीँ। 
अपनी कुछ तस्वीरें तक सम्भाल कर रखने का ख्याल नहीं किया।
यह एक कोई 30-35 साल पुरानी सौगात हमारे हाथ लगी जिसे संजो लिया।

Monday, May 9, 2011

कबीर के दोहों का रुसी में अनुवाद - समीक्षा

जब जेएनयु में था तब वरयाम सर ने बहुत सारी किताबें मुझे उपहार स्वरुप दी थीं। उन्हीं में से एक - कबीर के दोहों का रुसी में अनुवादित संकलन था। यह अनुवाद मूल भाषा हिन्दी से रुसी भाषा में येलेना शराबचियेवा और अनिल जनविजय जी द्वारा किया गया है। इसी संकलन से एक दोहा और उसका रुसी अनुवाद उद्घृत कर रहा हूँ। प्रस्तुत दोहा आध्यात्मिक जगत के मार्ग पर अग्रसर साधक (जो यहाँ स्वयं कबीर हैं) के आध्यात्मिक अनुभवों पर आधारित है। 

सर गगन गुफा में अजर झरे।
बिन बाजा झनकार उठे जहँ परे जब ध्यान धरे।
बिन ताल जँह कँवल फुलाने तेहि चढ़ि हंसा केलि करे।
बिन चंदा उजियारा दरसे जहां तहँ हंसा नजर  परे।
दसबे द्वार तारि लागी अलख पुरुष जाके ध्यान धरे।
काल कराल निकट नहिं आवै, काम क्रोध मद लोभ जरे।
जुगन जुगन की तृष्णा बुझानी कर्म धर्म अध व्याधि टरे।
कहे कबीर सुनो भई साधो अमर होय कबहुं न मरे।

Нектарный дождь идёт все время
В той сфере неба, что от взора скрыта.
Без инструментов музыка прекрасная звучит.
Лотос цветет, но нет резервуара,
И лебеди вокруг резвятся.
Там нет луны, 
Но залито все ярким лунным светом.
Когда Всевышний начинает думать о тебе,
Снимается замок с десятой двери, -
Ни смерть, ни страх приблизиться уже не могут,
Сгорает похоть, гнев, гордыня, жадность; 
Жажда, что мучила на протяженье
Многих юг, утоленье получает;
Болезни все, и карма вся, джапа - 
Все исчезает.
Говорит Кабир:
"Слушай, о садху!
Ты станешь бессмертным,
Ты никогда не умрёшь".

सर्व श्री आशुतोष जी महाराज के शिश्यत्व में आध्यात्म मार्ग पर अग्रसर हूँ और महाराज जी की कृपा से ही इस क्षेत्र की बारीकियों की जो थोड़ी-बहुत समझ मुझमें विकसित हूई है उसके आधार पर अनुवाद पर टिप्पाणि कर रहा हूँ। 
अनुवाद पठनीयता के दृष्टिकोण से अच्छा है। पठनीयता बनाए रखने के उद्देश्य से ही रुसी में पंक्तियों की संख्या ज्यादा हो गई है जो उचित है। इसके बावजूद कुछ ऐसे बिन्दु हैं जहाँ सुधार की गुंजाइश है। जिन शब्दों को गुलाबी रंग से मार्क किया है उनका अनुवाद नहीं हुआ है और जिस पंक्ति को नीले रंग से चिन्हित किया है उसका अनुवाद संतोषजनक नहीं है। "सर" और "गुफा" ये दोनों ही शब्द बड़े ही महत्वपूर्ण हैं इन्हें किसी भी स्थिति में हटाया नहीं जाना चाहिए था। बिना किसी बाजे के झनकार तभी उठती है जब साधक ध्यान धरता है। अनुवाद में बाजे के बगैर झनकार तो है पर ध्यान का जिक्र कहीं नहीं है। मूल में हंस एक है पर अनुवाद में हंस कई हो गए हैं जो आधयात्म के अनुसार बिल्कुल गलत है। कबीर कहते हैं कि बिन चंदा के उजियारा तब होता है जब उस हंसा पर नजर पड़ती है जबकि अनुवाद में बिन चंदा के उजियारा तो है पर हंसा पर नजर पड़ने का बात गोल है। दसवें द्वार पर ताला लगे होने की बात कबीर कर रहे हैं, अलख पुरुष जिसका ध्यान करता है परन्तु अनुवाद में उस ताले के ईश्वर के द्वारा याद किए जाने पर खुल जाने का जिक्र करना अनुवादक की अपनी कल्पना है। अंतिम की तीन पंक्तियों का अनुवाद बिल्कुल परफेक्ट है।


Wednesday, May 4, 2011

मसूरी के "गनरॉक" पर

साल 2004, रुसी सीखना अभी शुरु ही किया था कि हमें गर्मी की छुट्टियों में पार्ट टाइम नौकरी करने देहरादून जाने का सुनहरा अवसर मिला और बस बोरिया-बिस्तर बाँध हम पहुँच गए उत्तरांचल।
इसी दौरान मसुरी जाने का मौका मिला और यह तस्वीर मसूरी की सबसे उँचे स्थान "गन रॉक" की है। मीणा भाई, धर्मेन्द्र बाबु, सुमन ब्रदर्स (चंदन सुमन एवं शेखर सुमन जी) के साथ गुजारे गए वो दिन यादगार रहेंगे।

Monday, April 25, 2011

डिमरी सर के लिए...

कितना अच्छा लगता है जब एक शिक्षक के रुप में आप बच्चों के साथ ईमानदारी पूर्वक अपना ज्ञान साझा करते हैं और फिर वही बच्चे आपके उस परिश्रम के एवज में थोड़ा सम्मानऔर प्यार आपको वापस लौटाते हैँ। इसी प्रक्रिया का एक सुखद उदाहरण आज डिमरी सर और उनके द्वारा पढ़ाए गए विद्यार्थियों ने पेश किया।
रशियन फस्ट ईयर के बच्चों ने डिमरी सर को विदाई देने के उद्देश्य से एक छोटे पर प्यारे से कार्यक्रम का आयोजन किया। मैं उनके साथ एक्स्टर्नल के रुप में इन्ही बच्चों के सेमेस्टर की अंतिम परिक्षा में शामिल था। परीक्षा समाप्त होते ही बच्चों ने आग्रह किया की मैं डिमरी सर को थोड़ी देर तक व्यस्त रखुं ताकि वे जरुरी तैयारियाँ कर सकें। हम चाय पीने चले गए इतनी देर में उन्होने पंखे के उपर फूल वगैरह रख दिए। जब तक लौट कर आए तब तक उन्होने सारी तैयारी पूरी कर ली थी और स्कूल के अन्य अध्यापकगण भी आ चुके थे। सर के अपना स्थान सम्भालते ही उन्होने सामने केक सजाया और मोमबत्ती जलाई फिर पंखा चलाया और फूलों की बरसात के बीच सर ने केक काटा। बस शुरु हो गया उनको केक खिलाने का सिलसिला। सारे बच्चे उन्हे अपने हाथों से केक खिलाना चाहते थे। फिर उनके लिए तैयार की गई एक स्पीच पढ़ी उन्होने और प्यारी सी कविता सुनाई। थोड़ा मजाक भी किया  "सर अब स्ट्रेस और इन्टोनेशन का क्या होगा?" और एक ने तो उनसे ही प्रश्न पूछ डाला "Что вы любите делать в свободное время?" अर्थात "आप खाली समय में क्या करना पसंद करते हैं?" अभी थोड़ी देर पहले तक वो बच्चों से यही प्रश्न पूछ रहे थे। एक बच्चे ने मशहूर भोजपूरी लोकगीत के तर्ज पर गाना गाया जिसके बोल थेः "इएफएल के रशियन पढईया सबके दीवाना बनवले बा"। 
   इस तरह के आयोजनों को देख कर मन को थोड़ा सुकून मिलता है कि चलो शिक्षक और विद्यार्थी का रिस्ता अभी पूरी तरह दूसरे काम-काजी सम्बंधों की तरह रुखा-सुखा यानि प्रोफेसनल नहीं हुआ है कि अभी भी इसमें भावनाओं की नमी बाकी है।
 


Monday, April 11, 2011

तेरे साये में...

हैदराबाद में आने के बाद गुरु घर की सेवा करने के खूब अवसर मिले जो दिल्ली में काफी पास होते हुए भी संभव न हो सका। यहाँ आने के बाद ही सेवा और साधना ठीक से हो सकी और तभी गुरु के उस महान ज्ञान को थोड़ा बहुत समझ सका हूँ। अब तो बस यही प्रार्थना करता हूँ किः
तुम ऐसे ही सेवा के अवसर
उपलब्ध कराते रहना प्रभु
कि मैं तेरे समीप
रौशनी में रहना चाहता हूँ
कि मैं फिर पलटकर
उन अंधेरी गलियों में 
जाना नहीं चाहता
फिर-फिर जब
ये मुझको खुद में समेटने लगे
जब खुद को भूल
मैं इनकी ओर बढ़ने लगुँ
  इक खबर बस भिजवा देना
जरा याद दिला देना

Saturday, April 9, 2011

गाँव की पार्ट टाइम नौकरी...

घर के सामने के आम के पेंड़ की यह डाल सूख गई थी सो हमने उसे काट देने की सोची। सही में भी कुल्हाड़ियां चलाईं थीं पर यह तस्वीर तो सिर्फ तस्वीर खिंचवाने के उद्देश्य से पोज ले कर खिंची गई थी। लकड़ी काटते हुए फोटो खिंचवाना अब बचकानी हरकत सी लगती है। अब खिंचवा ही लिया है तो चलो चिपका देते हैं ब्लॉग पर।
गाँव जा कर पार्ट टाइम में ऐसे ही दूसरे बहुत से काम करते हुए खूब मजा आता है। अच्छी तरह समझता हूँ कि अगर फूल टाइम यही करना पड़े तो  सारी हेकड़ी निकल जाएगी।

Friday, April 8, 2011

नर्मदा मेस कर्मचारियों और साथी हॉस्टलर्स के साथ...

नर्मदा हॉस्टल में रहने का मजा ही कुछ और था। इस हॉस्टल से इतना प्यार हो गया था कि जब एम.फिल मे नर्मदा छोड़ने की बात आई तो कई दिनों तक मैने DSW के चक्कर लगाए कि मुझे डबल रहने में कोई ऐतराज नहीं कृप्या मुझे नर्मदा में ही रहने दिया जाए। पर ऐसा संभव ही नहीं था। आखिर कावेरी जाना पड़ा।