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Sunday, May 10, 2015

मेरी माँ


मड़ईया हमारी चू रही है
गईया भींग रही है
खेत हमारे मू रहे हैं
बालियाँ गिर रहीं हैं
और
वो अकेली
घूम रही है घर-घर
जाने-मजुरों से गुहार लगा रही है
छा दो हमारी मड़ई
गईया भींग रही है
काट दो हमारे खेत
बालियाँ गिर रहीं हैं
आँखें भर आती हैं
दिल रोता है
क्योंकि
ये तीनों
माँ हैं - मेरी माँ


-कुँवर कान्त




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