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Saturday, February 23, 2013

एकालाप

सुबह पाँच बजे उठते ही उपर छत पर बने संडास की ओर लपका। कोई फायदा नहीं...अन्दर कोई पहले से ही बैठा था सो उसके निकलने का इंतजार करने लगा। मकान मालिक की बहु निकली। मैं फौरन दूसरी तरफ घुम कर पेंड़ गिनने लगा। अब ऐसी जगह से निकलने वाले से आँखें मिलाना तो बेशर्मी की हद ही होगी और फिर आप नमस्ते भी तो नहीं कह सकते। वो भी चुपचाप नीचे उतर गई। उसके जाते ही झटपट फारिग हुआ। नीचे उतरा तो पापा तब तक आटा गूँथ चुके थे। मैने रसोई सम्भाली और अब वो छत पर चले गए। मैने फटाफट रोटियाँ बनाई। दूध लाकर गर्म किया। फिर मुँह धोकर नहा लिया। दूध रोटी खाया। इधर पापा नहाने गए और मैं काम पर निकल पड़ा। व...बाद से सीधा अ...पूर पहुँचा। अफरा तफरी मची थी। सभी अपना-अपना लॉट लेकर भागने की तेजी में थे। जल्दी से मैने भी अपना लॉट सम्भाला और करेला की बस पकड़ी। मैं करेला गाँव की कुरियर फ्रेंचाइजी कम्पनी में कुरियर ब्वॉय हूँ। अभी नई नौकरी है। दिल्ली पढ़ने आया था पर अखबारों में दो सप्ताह इश्तिहार देखता रहा तब जाकर यह मिली।

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