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Friday, October 14, 2011

भूखा




आप धूर्त और मक्कार हैं

बिना किसी प्लानिंग के
युँ ही हैं निकल पड़ते
शहर की सड़कों पर
इधर-उधर सरकते हुए
मॉलों-अटारियों पर
छलकते-मचलते हुए
कइयों किलोमीटर
क्योंकि आज इतवार है,
तोड़े हैं पैसे
और आपके पास खाली समय भी है भरपूर

या फिर हो सकता है

किआप बेकार और बेरोजगार हैं
बिना किसी प्लानिंग के
युँ ही हैं निकल पड़ते
शहर की सड़कों पर
इधर-उधर झांकते हुए
रेहड़ी-पटरियों पर
बुझते-सुलगते हुए
दसियों किलोमीटर
क्योंकि आज जाने कौन सा वार है
थोड़े हैं पैसे
और आपके पास खाली कुसमय है भरपूर



Wednesday, November 3, 2010

वो और हम...

वो दिवारों को कान लगवाने की बस बात भर करते हैं
तो हम फुसफुसाना भी बंद कर देते हैं।

Thursday, April 8, 2010

तुम्हारी याद मे














कौन कहता है
देखा न गया तुमसे
अपनो का तड़पना
सह न पाए तुम
उनका बिलखना
और बंद कर लिया 
तुमने
अपने दिल का
धड़कना
लोग कहते हैं
देखा न गया उनसे 
तुम्हारा अपनों 
के लिए लड़ना
सह न पाए वो
तुम्हारी छटपटाहट
और बंद कर दिया
उन्होने
तुम्हारे दिल का 
धड़कना

Tuesday, April 6, 2010

पेन्सिल

आज सुबह 
स्कुल ड्रेस पहने
वो छोटी सी बच्ची
उसकी मां ही रही होगी
बाँह पकड़ खींचे लिेए 
जा रही थी
झिड़कियां दे रही थी
डांट-फटकार रही थी
उसकी आँखे 
गीली हो चली थी
चेहरा पीला सा था
दांतों को भींचे
होंठ सिले हुए
बस्ता टांगे
बांह छुड़ाने की 
कोशिश करती
वो घीसटती सी 
चली जा रही थी
मैने सोचा
ऐसा क्या कर दिया 
इस नन्ही सी जान ने
कि तभी मां चिल्लाई
ऐसे रोज-रोज पेन्सिल 
गुम करेगी 
तो मैं तेरा.....
................................ 

Tuesday, March 30, 2010

आग

एक सिरा जल रहा है
उसका
पर आशचर्य कि दूसरा
बर्फ सा ठंडा पड़ा है
तीसरा, चौथा ....
जाने कितने सिरे हैं उसके
सब खामोश खड़े हैं
तमाशा देख रहे हैं
धु-धु कर जल रहा है
जाने कितने रंग की आग
निकल रही है उसके भीतर से
लाल, पीला, हरा, नारंगी, बैंगनी
बर्दास्त नहीं हो रहा
इतनी तेज है आंच
भीतर तक
सबकुछ झुलसाए जा रही है
पर आश्चर्य कि
दूसरे सिरे
अजीब से हैं, ठिठुर रहे है
कुछ गल रहा है उनमे
पीछे की तरफ
उपर से नीचे तक
वो आग ढुंढ रहे हैं
जलाने के लिए जलावन
ढुंढ रहे हैं
लकड़ी, कोयला, डीजल,
पेट्रोल....
सब कुछ बड़ा अजीब है
अरे मुर्खराज!
इतना भी नही समझते
पर्दा धीरे से हटाओ
आहट न होने पाए
वर्ना आग बुझ जाएगी
सपना टूट जाएगा

Friday, March 12, 2010

कैसे भूल जाउं...

कैसे भूल जाउं
कि
तपती दोपहरी में
कड़कड़ाती ठंड में
स्टेशन की पटरी पर
रास्तों चौराहों पर
वो जमीन पर रेंगते हैं 
उनके पांव नहीं हैं
उनके हांथ भी नहीं है
हां आंड़े तिरछे धड़ पर
टूटा-फूटा सिर जरुर है
कुछ बेसुध 
नालियों में पड़े हैं
कुछ उपर से नीचे तक
सड़ चुके है
और अजीब सी भाषा में
जाने क्या 
बड़बड़ाते रहते हैं
इनमें से कुछ कचरे 
की ढेरी में ही जीते हैं
और मरते हैं
कि वो ज़मीन पर रेंगने
वाले कीड़े नहीं 
मेरी तरह ही
इंसान हैं
पर भूल जाता हुँ
सब भूल जाता हुँ
कुछ याद नहीं रहता
आखिर क्यों
देर नहीं लगती मुझे
सुनामी, भुकंपों, दुर्घटनाओं
बिमारियों से 
दम तोड़ते इंसानों को भूलाने में?
क्या सिर्फ इसलिए कि
उनका मेरे "मैं" 
से कोई संबंध नहीं?
या फिर इसलिए कि 
पूरी उम्र गुजर जाती है
इस "मैं" की 
और संबंधों के
सही मायनों से
अंजान ही चला जाता है वो
हम सब को छोड़कर?

Tuesday, March 9, 2010

अनगिनत सच...

मुकदमा बड़ा गंभीर है -
बताओ तो जरा फूल 
लाल थे कि सफेद ?
एक ने कहा लाल
दूसरे ने सफेद
दोनो को ही था 
अपनी आँखों पर 
पक्का यकीन
फैसला तो कब
का हो चुका
इतिहास के पन्नों
में दर्ज हो चुका
कसूरवार दोनों ही
न थे
पर इसका क्या करें
कि दोनों फरियादी
न देखना चाहते हैं
न सुनना
कि वो अब बहरे 
और अंधे हो चुके हैं
वो तो सिर्फ बोलना
चाहते है
चिल्लाना चाहते हैं
एक दूसरे को 
गलत साबित करना
चाहते हैं

Wednesday, March 3, 2010

सबसे बड़ा आश्चर्य....

यक्ष ने पुछा
बोलो इस संसार का सबसे 
बड़ा आश्चर्य 
क्या है?
उसने कहा 
रोज सैकड़ों की संख्या
में हो रही मौतें
कड़वा ... ही सही पर
बनावटी नहीं
सैकड़ों की संख्या में
जलती दफन होती 
लाशें
भयावह सही पर
झूठी नहीं
तिस पर भी खुद को
अमर माने बैठा 
अफसोस करता और
हर बार विदा हो चुके
को बेचारे की संज्ञा देता 
इंसान...
भला इससे बड़ा
आश्चर्य 
और 
क्या हो सकता है?

Friday, February 12, 2010

रीढ़

इतना लचीला बनाओ
कि नाक सटे
घुटनें के बाद और
सिर का पिछला भाग 
घुटनें के आगे
घोंट-घोंट कर लबसी
बना दो कि
जहें हाँथ डालो तहें
घुस जाए
और मिलाते रहो पानी
की अकड़नें न पाए।
कि अकड़नें और टुटनें
के बीच
उसके होनें, न होनें 
के बीच 
का अंतर ही
छु-मंतर हो जाए।

Friday, January 29, 2010

मैं कौन हूँ....

पुराने ब्लॉग से....
"मैं रास्ते पर रेंगते हुए किसी बिलबिलाते केंचुए की तरह हूँ। मुश्किल तो यह है कि अपने ऊपर पड़ते पाँव या साइकिल के पहियोंको देख कर भी मैं असहाय उन्हें अपने से हो कर गुजरने देता हूँ क्यों कि सांप कि तरह तेज रेंग कर ना तो मैं झाडियों में छिप हीसकता हूँ और ना ही अपने बचाव में या गुस्से से ही सही फन उठा कर डरा या डस ही सकता हूँ मैं रोज़ सैकड़ों कि संख्या  में मरता हूँ और हजारों की संख्या में फिर पैदा होकर उन्ही रास्तों पर बिलबिलाते हुए रेंगने लगता हूँ। "

Monday, January 25, 2010

मजबूरी...

एक बार फिर वही अहसास
पर अफसोस कि
तोड़ न पाया जिम्मेदारियों के पाश
लो आज फिर जलाता हुँ
होली और कर देता हूँ
स्वाहा तुम्हें भी
सदा के लिए
राख कर बिखेर देता हुँ 
अतीत के गलियारों में

Thursday, January 21, 2010

इंसान....

इंसान
शहरों में
कमरों,केबिनों में
बंद हो रहा
गाँवों में
खेत, खलिहानों में
अपनों से
मिलने को
तरस रहा 
चाहकर भी
ये तिलिस्म
न तोड़ पा रहा
पल-पल
निहायत अ के ला
हो रहा 
इंसान

Tuesday, January 19, 2010

स्वाद की खातिर...सेहत के बहानें

गर्दन काट दी
चमड़ी उधेड़ दी
उलाटा पलाटा
बोटी-बोटी काटा
और लगा दी 
प्रदर्शनी
उसके जिस्म की
बोटियों की
आए खरीदार बहुतेरे
उसे करेजा चाहिए
आप गु्र्दा लिजिए
बचा-खुचा
कुत्तों को चुनने दिजिए
अंत में सबनें
अंगुलियों को चाटा 
और कहा
बड़ा मजा आया

Wednesday, January 13, 2010

स्विच इट ऑफ....




उनके होनें का अहसास उतना प्रबल न हुआ होता अगर विभिन्न प्रकार के इन दूर संचार माध्यमों का इतना विभत्स प्रचार प्रसार न हुआ होता

Friday, August 14, 2009

My extensions.....

I am so eager to put more and more "MY" labels while, they are cunning enough to exploit this particular weakness of mine.

Thursday, August 13, 2009

Useless items....

What immediate links one can have with HIS speaker boxes?
  • They stopped working and you became worried. You loose your peace of mind because they are sitting idly.
  • Once they have been given some task, and since they willingly agreed to fulfil it,then why this dilly-dally?
  • They may have just popped out from the face of your computer table. You never knew them before and would have never cared, had they not been lying just before you like two useless swollen appendices. One on the left side of your body and one on the right.
  • Congratulations M....R.
If something similar happens to you, you may think that you have started feeling the life live.

Thursday, August 6, 2009

दुनियावी तकल्लफों से दूर....

कभी-कभी हमें न चाहते हुए भी कुछ काम दुसरों का दिल रखनें के लिए या फिर सामाजिक औपचारिकताओं को बस निभा देनें के लिए करना पड़ता है। उदाहरण के लिए मान लिजिए हम बड़ी तेजी में कहीं जा रहें हों, हो सकता है कि मू़ड भी खराब हो कि तभी अचानक कोइ जान-पहचान वाला मिल जाए। चेहरे पर बड़ी सी मुस्कान लिए आपकी ओर बढा चला आए। तो आप न चाहते हुए भी थोड़ा सा मुस्करायेंगे, दो मिनट के लिए रुक सकते हैं और फिर हंसते-हंसते विदा ले लेंगे। ऩाहक किसी पर अपनी तेजी या उलझन क्यों थोंपें - ऐसा आप मन ही मन सोचेंगे। उसकी परेशानी का ख्याल कर आप खुद थोड़ा कम्प्रोमाइज कर लेंगे।
ऐसा कभी आप करते हैं तो कभी आपके सामने वाला।
पर एक दूसरी तरह से भी हम व्यवहार करते हैं।
- मेरे काम में कोइ दखल न पड़नें पाए सामनें वाला जाए चुल्हे-भाड़ में। ऩहीं मानता मैं किसी सामाजिक औपचारिकता को, मैं तो इस औपचारिक समाज से ही तंग आ गया हुँ।
-बात आपकी भी ठीक है। इतनें तो जानने वाले, अगर मिलनें लगे तो सारा जीवन तो हाल-चाल पुछते ही निकल जाएगा।
वैसे भी काम दूसरे बड़े ज़रुरी करनें बाकी हैं सो जो छूट गया सो छूट गया जो साथ हैं उन्हें सम्भालना जरुरी है।
अब किस-किस का मन रखेंगे आप जब सारे अपने मन का ही करनें को आतुर हैं

Thursday, April 23, 2009

मैं कौन हूँ....

पुराने ब्लॉग से.....

"मैं रास्ते पर रेंगते हुए किसी बिलबिलाते केंचुए की तरह हूँ मुश्किल तो यह है की अपने ऊपर पड़ते पाँव या साइकिल के पहियोंको देख कर भी मैं असहाय उन्हें अपने से हो कर गुजरने देता हूँ क्यों की सांप की तरह तेज रेंग कर ना तो मैं झाडियों में छिप ही सकता हूँ और ना ही अपने बचाव में या गुस्से से ही सही फन उठा कर डरा या डस ही सकता हूँमैं रोज सैकडों की संख्या में मरता हूँ और हजारों की संख्या में फिर पैदा होकर उन्ही रास्तों पर बिलबिलाते हुए रेंगता हूँ ।"

Friday, April 17, 2009

क्या करूँ???

पिछले दो दिनों से दिमाग ठप्प पड़ा है। बार बार नए संकल्प लेकर बैठता हूँ पर विचारों को क्रमबद्ध करने में असमर्थ ही रहता हूँ। चुनी हुई कहानियों के विषय में कोई आलोचनात्मक साहित्य नही मिल रहा। आज का दिन भी ख़त्म होने को है और बात बनती नज़र नही आती। कभी - कभी ऐसी dead-lock की स्थिति बन जाती है। अब देखें कब तक इस से उबार पता हूँ।

Thursday, April 16, 2009

पता नही क्या होगा.....

यह पोस्ट मैंने अपने पुराने ब्लॉग पर लिखा थाइसे एक बार फिर इस ब्लॉग पर प्रकाशित कर रहा हूँ...

वो
रात को बारह बजे के आस पास आया होगा। हम बस सोने ही जा रहे थे। दरवाज़ा खटखटाया....छूटते ही बोला:
गरीबी की कोई परिभाषा है, तो प्लीज मुझे बताइए, इस ज़माने में कौन गरीब है, आदमी की गरीबी का कोई पैमाना है, कोई मापदंडहै? आखिर कोई तो वास्तव में गरीब होगा, आख़िर उस तक हम पहुचेंगे कैसे यहाँ तो जिसको देखिये वही गरीबी का ही रोना रोतारहता है। गरीब होना जैसे फैशन हो गया है।
अब कल तो हद हो गई
मैं रास्ते से जा रहा था कि कुत्ते भौकने लगे मेरे ऊपर से पास खड़ा आदमी कहता है 'अरे छोड़ दे रे! इस बेचारे गरीब पर क्योंभौकता है' उसने मुझे क्यों गरीब बोला, जान पहचान, अच्छा भला पहनता-खाता हूँ और मैं भी गरीब हो गया और वो भी कुत्ते केसामने .........
उसके सवालों के जवाब हमारे पास नही थे सो हमने वही घिषी-पीटी बातें की : पता नही क्या होगा इस ज़माने का और ऐसी ही दोचार रटे-रटाए जुमले जो इस तरह के मौको पर बोलने चाहिए। नींद बहुत जोरों की रही थी और सुबह जल्दी उठाना भी था।