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Sunday, April 5, 2015

दूध वाला


वो मेरे सामने चला आ रहा था
हाथ में पकड़ी कापी में
सिर नीचे गड़ाए
कंधे से तिरछा
बैग लटकाए।
बड़ा पढ़ाकु लगता है...
हम एक-दूसरे के बगल से गुजरे
अचानक लगा
जैसे पहचान का लगता है
मै पीछे मुड़ा
वह भी मुड़ा
अरे  ये तो अपना
दरवाजो पर घंटियाँ बजाता हुआ
हैडलों मे टंगी थैलियों,
पॉलिथिनों में
नीली, लाल, हरी
टोन्ड, डबल टोन्ड
फुल क्रीम पैकेटें डालता हुआ
बिल्डिंग की सिढ़ियों पर
उछलता भागता हुआ
बब्लु है
दुध वाला

-कुँवर कान्त


Saturday, April 4, 2015

कैसे लिखुँ...


कैसे लिखुं शब्दों में उस दर्द को
नम आँखें
काँपते होंठ
सुन्न होता शरीर
आँखों के आगे छाता
घोर अंधकार
लिख तो दिया
पर लिखा नही
आँखों का पानी
होंठों की जुबानी
शरीर से परे
आजाद होने को छटपटाता
स्याह आकाश
कैसे लिखुं शब्दों में इस हर्ष को
पथरीली आँखें
जर्द होंठ
अकड़ा हुआ शरीर
पर्दे के पीछे छाता
झीना प्रकाश

- कुँवर कान्त


Tuesday, May 17, 2011

कोढ़ी बुढ़िया

अभी बाजार बंद है
मंडरा रहे हैं सड़कों पर
दूधिये और अखबार वाले
और घूम रहे हैँ भिखमंगे
बंद डिजायनर साड़ियों की दूकान
सामने बैठी है चीथड़ों में लिपटी
एक कोढ़ी बुढिया
दो पोटले साथ लिए
एक स्टील का गिलास और
एक छोटा भगोना हाथ लिए
फैलाती है वह अपने कोढ फुटे
हाथ आने-जाने वालों को सामने
हाथों में है चुड़ियाँ
और नाक में चमकती
सुनहले रंग की कील
.
.
.
लगता है काफी माल
बटुर गया है
सो लगाती है हिसाब
पहले सिक्के गिन रखती है
बटुए में
फिर लगाती है वह हिसाब पापी पेट का
पॉलीथीन खोल-खोल कर देखती है
सूंघती है, छूती है और बांटती है
उन्हे दो हिस्सों में
एक को झोले में डाल
दूसरा फेंक आती है
कूड़े के ढेर में
टूटे चप्पल एक ओर रख
अपने आसनी को झाड़ती है
मुझे लगा कि वो अपना दूकान
समेट रही है कि
शोरुम के खुलने का समय
हो रहा है
पर नहीं दिशा बदल कर
वह एक बार फिर बैठ जाती है
अब उसके सामनै है रविवार
की प्रार्थना के लिए जुट रहे लोगों का
"The King's Temple".

Monday, November 1, 2010

कुदक्कड़ मन

हिलता मचलता
फुदकता उछलता
कभी इस डाल
तो कभी उस डाल
बेचैन सा वो जाने
क्या ढुँढता
कभी रस - कभी गंध 
तो कभी
वो सुखद स्पर्श
वो सुरीली आवाज़
बस एक नज़र देखने
को तड़पता
मेरा कुदक्कड़ मन

Thursday, April 8, 2010

तुम्हारी याद मे














कौन कहता है
देखा न गया तुमसे
अपनो का तड़पना
सह न पाए तुम
उनका बिलखना
और बंद कर लिया 
तुमने
अपने दिल का
धड़कना
लोग कहते हैं
देखा न गया उनसे 
तुम्हारा अपनों 
के लिए लड़ना
सह न पाए वो
तुम्हारी छटपटाहट
और बंद कर दिया
उन्होने
तुम्हारे दिल का 
धड़कना

Tuesday, April 6, 2010

पेन्सिल

आज सुबह 
स्कुल ड्रेस पहने
वो छोटी सी बच्ची
उसकी मां ही रही होगी
बाँह पकड़ खींचे लिेए 
जा रही थी
झिड़कियां दे रही थी
डांट-फटकार रही थी
उसकी आँखे 
गीली हो चली थी
चेहरा पीला सा था
दांतों को भींचे
होंठ सिले हुए
बस्ता टांगे
बांह छुड़ाने की 
कोशिश करती
वो घीसटती सी 
चली जा रही थी
मैने सोचा
ऐसा क्या कर दिया 
इस नन्ही सी जान ने
कि तभी मां चिल्लाई
ऐसे रोज-रोज पेन्सिल 
गुम करेगी 
तो मैं तेरा.....
................................ 

Tuesday, March 30, 2010

आग

एक सिरा जल रहा है
उसका
पर आशचर्य कि दूसरा
बर्फ सा ठंडा पड़ा है
तीसरा, चौथा ....
जाने कितने सिरे हैं उसके
सब खामोश खड़े हैं
तमाशा देख रहे हैं
धु-धु कर जल रहा है
जाने कितने रंग की आग
निकल रही है उसके भीतर से
लाल, पीला, हरा, नारंगी, बैंगनी
बर्दास्त नहीं हो रहा
इतनी तेज है आंच
भीतर तक
सबकुछ झुलसाए जा रही है
पर आश्चर्य कि
दूसरे सिरे
अजीब से हैं, ठिठुर रहे है
कुछ गल रहा है उनमे
पीछे की तरफ
उपर से नीचे तक
वो आग ढुंढ रहे हैं
जलाने के लिए जलावन
ढुंढ रहे हैं
लकड़ी, कोयला, डीजल,
पेट्रोल....
सब कुछ बड़ा अजीब है
अरे मुर्खराज!
इतना भी नही समझते
पर्दा धीरे से हटाओ
आहट न होने पाए
वर्ना आग बुझ जाएगी
सपना टूट जाएगा

Friday, March 12, 2010

कैसे भूल जाउं...

कैसे भूल जाउं
कि
तपती दोपहरी में
कड़कड़ाती ठंड में
स्टेशन की पटरी पर
रास्तों चौराहों पर
वो जमीन पर रेंगते हैं 
उनके पांव नहीं हैं
उनके हांथ भी नहीं है
हां आंड़े तिरछे धड़ पर
टूटा-फूटा सिर जरुर है
कुछ बेसुध 
नालियों में पड़े हैं
कुछ उपर से नीचे तक
सड़ चुके है
और अजीब सी भाषा में
जाने क्या 
बड़बड़ाते रहते हैं
इनमें से कुछ कचरे 
की ढेरी में ही जीते हैं
और मरते हैं
कि वो ज़मीन पर रेंगने
वाले कीड़े नहीं 
मेरी तरह ही
इंसान हैं
पर भूल जाता हुँ
सब भूल जाता हुँ
कुछ याद नहीं रहता
आखिर क्यों
देर नहीं लगती मुझे
सुनामी, भुकंपों, दुर्घटनाओं
बिमारियों से 
दम तोड़ते इंसानों को भूलाने में?
क्या सिर्फ इसलिए कि
उनका मेरे "मैं" 
से कोई संबंध नहीं?
या फिर इसलिए कि 
पूरी उम्र गुजर जाती है
इस "मैं" की 
और संबंधों के
सही मायनों से
अंजान ही चला जाता है वो
हम सब को छोड़कर?

Tuesday, March 9, 2010

अनगिनत सच...

मुकदमा बड़ा गंभीर है -
बताओ तो जरा फूल 
लाल थे कि सफेद ?
एक ने कहा लाल
दूसरे ने सफेद
दोनो को ही था 
अपनी आँखों पर 
पक्का यकीन
फैसला तो कब
का हो चुका
इतिहास के पन्नों
में दर्ज हो चुका
कसूरवार दोनों ही
न थे
पर इसका क्या करें
कि दोनों फरियादी
न देखना चाहते हैं
न सुनना
कि वो अब बहरे 
और अंधे हो चुके हैं
वो तो सिर्फ बोलना
चाहते है
चिल्लाना चाहते हैं
एक दूसरे को 
गलत साबित करना
चाहते हैं

Monday, March 8, 2010

सत्ता की लड़ाई...

जिनके पास सत्ता है
वो-
सब चोर हैं
बदमाश हैं
धोखेबाज हैं
भ्रष्टाचार में लिप्त हैं
जिनके पास नहीं है
वो -
सब साधु हैं
नेक हैं
इमानदार हैं
सदाचार ही उनका जीवन है
यही इस सत्ता की लड़ाई
का नियम है
कि 
वो कब वो 
बन जाते हैं
इसका पता खुद उनको
भी नहीं चलता
दुख इस बात का है
कि हर बार
इस दौरान
कुछ चंद हजार-लाख
इंसानी जिंदगियाँ
मिट्टी की ढेरी में
बदल जाती हैं
और मजा इस बात में
कि ये बदलाव 
शायद ही कभी स्थायी
हो पायेगा। 

Wednesday, March 3, 2010

सबसे बड़ा आश्चर्य....

यक्ष ने पुछा
बोलो इस संसार का सबसे 
बड़ा आश्चर्य 
क्या है?
उसने कहा 
रोज सैकड़ों की संख्या
में हो रही मौतें
कड़वा ... ही सही पर
बनावटी नहीं
सैकड़ों की संख्या में
जलती दफन होती 
लाशें
भयावह सही पर
झूठी नहीं
तिस पर भी खुद को
अमर माने बैठा 
अफसोस करता और
हर बार विदा हो चुके
को बेचारे की संज्ञा देता 
इंसान...
भला इससे बड़ा
आश्चर्य 
और 
क्या हो सकता है?

Friday, February 12, 2010

रीढ़

इतना लचीला बनाओ
कि नाक सटे
घुटनें के बाद और
सिर का पिछला भाग 
घुटनें के आगे
घोंट-घोंट कर लबसी
बना दो कि
जहें हाँथ डालो तहें
घुस जाए
और मिलाते रहो पानी
की अकड़नें न पाए।
कि अकड़नें और टुटनें
के बीच
उसके होनें, न होनें 
के बीच 
का अंतर ही
छु-मंतर हो जाए।

Monday, January 25, 2010

मजबूरी...

एक बार फिर वही अहसास
पर अफसोस कि
तोड़ न पाया जिम्मेदारियों के पाश
लो आज फिर जलाता हुँ
होली और कर देता हूँ
स्वाहा तुम्हें भी
सदा के लिए
राख कर बिखेर देता हुँ 
अतीत के गलियारों में

Thursday, January 21, 2010

इंसान....

इंसान
शहरों में
कमरों,केबिनों में
बंद हो रहा
गाँवों में
खेत, खलिहानों में
अपनों से
मिलने को
तरस रहा 
चाहकर भी
ये तिलिस्म
न तोड़ पा रहा
पल-पल
निहायत अ के ला
हो रहा 
इंसान

Friday, November 20, 2009

रुपयों की कीमत...

बस सात दिन बचे हैं
जब तक पहुंचुँगा बचेंगे पाँच
पापा-अम्मा कहते हैं
नेवता करनें आ रहे हो क्या?
अब मैं क्या कहुँ 
रुपये-जो कमा रहा हुँ
अपनों से दूर रहकर
उन रुपयों की कीमत
चुका रहा हुँ
27 नवम्बर को बहन कंचन की शादी है सो कल सुबह गाँव जा रहा हुँ। इश्वर से यही प्रार्थना है कि सब ठीक से निपट जाए और बहन अपनें नए घर में सबका मन जीत एक सफल एवं सुखी दाम्पत्य जीवन जीए


Saturday, October 24, 2009

कसक

भरी है इतनी कालीख,
लिख कलम कोई लेख
भरा है इतना कचरा
बहा दे कतरा कतरा
देख फैली है कैसी दुर्गंध
अरे अब तो रच कोई छंद

Tuesday, June 23, 2009

वो और हम

वो ज़मीन पर गिरे मदद को चिल्ला रहे थे,
हम अपनी-अपनी चमड़ी बचा रहे थे,
किसी के साथ कभी-भी कुछ-भी हो सकता है,
हमने कहा और भूल गए,
वो रहे या ना रहे,
इसका हमारे होने या ना होने से क्या वास्ता,
हम अनंत तक सड़ते-गंधाते रहेंगे,
पर इसका क्या करें कि,
हर पल हम वो और वो,
हम होते जा रहे हैं.