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Tuesday, August 14, 2012

मेरा गाँव-मेरा घर


याद करता हूँ तो दर्द होता है। सत्रहवाँ साल चल रहा था, जब बसंत की एक भोर, घर छोड़ कर जाना पड़ा था। मैं भी खेलना-कूदना चाहता था। नंगे पाँव चिकने काँच की तरह चमकती बर्फ पर फिसलना चाहता था पर इसकी जगह अथाह अनजान जीवन की ओर जाना पड़ा जहाँ कोई रिस्तेदार तो दूर जानने-पहचानने वाला भी नहीं था। उदास था और थोड़ा भयभीत। माँ गाँव से बाहर तक छोड़ने आई थी। रास्ते को प्रणाम कर धरती पर बैठ गई और रोने लगी थी। मैं जानता था कि वह दुखी थी और भयभीत भी पर एक माँ के लिए अपने भूखे बच्चों को देखना इससे ज्यादा दुखदायक और भयानक होता है। बहन वहीं रह गई, वह अभी छोटी थी। जबकि मैं जा सकता था सो चला गया। -रुसी लेखक वसीली मकारविच शुक्शीन की जीवनी से।

Friday, October 9, 2009

खुशी की तालाश में...

"मेरी स्थिति ऐसे व्यक्ति की तरह है जिसका एक पाँव तो नांव में है और दुसरा किनारे पर और जिसे यह समझ नहीं आ रहा कि उसे नांव पर चढ़ आगे सफर पर जाना चाहिए या फिर उतरकर वापस चला जाना चाहिए।"  
उपरोक्त पंक्तियां रुसी साहित्यकार वसीली मकारोविच शुक्शिन की हैं। तब उनकी उम्र क़रीब चालीस वर्ष थी।


गाँव छोड़ा एक सुखद जीवन की आस में, सुविधासंपन्न जीवन की आस में। कड़ा परिश्रम किया, दर-दर की ठोकरें खाईं। पत्थर तोड़े, पंक्चर बनाए, बोझा ढोया और जाने क्या-क्या किया। पर परिश्रम रंग लाई, शहर की सबसे सफलतम वयक्तियों में से एक बन गए तुम। अब तुम्हारे पास सब कुछ था। दौलत, शोहरत, एक अच्छी पत्नी, दो प्यारी-प्यारी बच्चियां....लाखों चाहनें वाले। 


पर गांव के छुट जाने का उन्हें सदा अफसोस रहा। उनकी हर कृति ग्रामीण जनता की शहरों की ओर पलायन से संबंधित होती थी। 

Thursday, February 19, 2009

Сейчас в России начался взлёт интереса к Шукшину.


Сейчас в России начался взлёт интереса к Шукшину. После того, как кончилась советская жизнь, он перестал быть актуальным автором, и вышел из моды. Но, прошло 15 лет, и вдруг выяснилось, что Шукшин – это не «про советское», а «про вечное», про важное для всех и во все времена. Например, недавно в Москве состоялась премьера спектакля по рассказам Шукшина. Его поставил латвийский режиссер Алвис Херманис. В главных ролях – самые известные, талантливые и популярные русские актеры Евгений Миронов и Чулпан Хаматова. Это самая громкая и успешная премьера сезона – вся Москва гудит, и билетов (очень дорогих!) не достать. То есть Шукшина как бы открывают заново!*
Урррраааааа - Это я выражаю свою радость.
* Views expressed by a young playwright from Russia.