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Monday, May 3, 2010

गर्मी की छुट्टियां..

परिक्षाएं समाप्त हुईं और गर्मी की छुट्टियां शुरु हो गई सो अब समय है वापस जाने का वहा जहा से रोजी की तालाश मे निकले थे। सात-आठ वर्षों के बाद कुछ लम्बा समय घर पर बिताने की मोहलत मिली है सो बस लौट जाना चाहता हुँ। इस पूरे महीने अब और कुछ न लिख सकुंगा। सो अगली मूलाकात अब जून मे ही हो पाएगी

Wednesday, April 14, 2010

भूखे पेट खाना बनाकर खाने का सुख...

जब शाम को ऑफिस से घर लौटता हुँ तो बहुत थका हुआ होता हुँ। एक ही इच्छा बाकी रहती है कि बिस्तर पर गिरुँ और बस सो जाउँ। पर बचपन से माँ की रटाई नसीहत नही भूलती: "रात को कभी भूखे पेट नही सोना चाहिए"। सो बिस्तर पर पड़ा खुद को याद दिलाता रहता हुँ कि अभी खाना पकाना है, कि अभी सोना नही है। 
हर दिन खाना बनाने के पहले यही सोचता हुँ कि अगर खाना खाना मजबूरी न होती तो कभी न बनाता। पर पकाने के बाद जब खाना लेकर गुरुदेव के स्वरुप के सामने बैठता हुँ तो एक अजीब से सुकून का एहसास होता है। जब खा रहा होता हुँ तो किसी उत्सव के से भाव मन को विभोर कर रहे होते है और पीछे मजबूरी वाले ख्याल पर खेद प्रकट करते हुए खुद से वादा कर रहा होता हुँ कि आगे से खाना मै शौक से बनाउंगा न कि मजबूरीवश।

Saturday, April 10, 2010

दिवारें गिर रही हैं....



.......फिर अपनी हर वस्तु को बेध देने वाली इस दृष्टि की मदद से उसने दिवारो, समय और स्थान को सबको तहस-नहस कर दिया और छोड़े जा रहे जीवन के भीतर ही कही कुछ विस्तार से देखने लगा।
जीवन एक नए रुप मे सामने खड़ा था। वह पहले की तरह दिखाई देने वाली हर चीज को शब्दो मे बया कर देने की हड़बड़ी मे नही था, और इस , अपर्याप्त इंसानी भाषा मे ऐसे शब्द थे भी नही..........लोग भी उसे नए ही प्रतीत हो रहे थे। उसकी नई प्रबुद्ध दृष्टि मे सब उसे नए तरह से प्यारे और मनमोहक प्रतीत हो रहे थे। समय के उपर हवा मे तैरते हुए उसने साफ देखा कि मानव सभ्यता कितनी जवान है। अभी कल तक उसे लगता था कि सारे जंगली जानवर है जो जंगलो मे चिल्ला रहे है । अब तक जो लोगो के अंदर उसे डरावना लग रहा  था, अक्षम्य, विभत्स लग रहा था अचानक सब बड़ा प्यारा लगने लगा था – जैसे प्यारा लगता है किसी बच्चे का ठुमक-ठुमक कर चलना, उसका तुतलाना, उसकी हंसी दिलाने वाली छोटी-छोटी गल्तियां.....

Friday, March 26, 2010

पिछले दो हफ्ते...

कुछ भी लिख नहीं पाया। पहले हफ्ते तो इंटरनेट की परेशानी रही। स्कूल मे काम चल रहे होने की वजह से कुछ तारे कट गईं और पूरे हफ्ते इंटरनेट नही रहा। आदत ऐसी पड़ी है इसकी कि दिन भर रिफ्रेश करता रहता था कि अब आ जाए पर नही रहा सो नही रहा। फिर पिछले हफ्ते संस्थान के विदेशी छात्रों को लेकर दिल्ली और आगरा के स्टडी टूर पर चला गया। वहां इतना वयस्त रहा कि इंटरनेट के विषय में सोचने की फुर्सत ही नहीं रही। पिछले 6 दिन सुबह 6 बजे से लेकर रात के 12 बजे तक दौड़-भाग में ही बीते। हां ताजमहल के संगमरमरी पत्थरों पर जो कुछ पल लेट कर बिताए वो याद रहेंगे। 
इस बीच आए चिठ्ठियों के जवाब समय पर न दे पाया इसका अफसोस है।

Saturday, March 6, 2010

नारियल पानी

हर बार जब नारियल पानी पीता हूँ तो यही सोचता हूँ कि आखिर इस बन्द डिब्बे के अन्दर पानी आता कहाँ से है। सो आज इन्टरनेट खंगालने की सोची। कुछ खास हाथ नहीं आया हाँ नारियल पानी पीने के ढेर सारे फायदों का पता जरुर चला। 
पानी के अन्दर जाने का रहस्य उद्घाटित होना अभी बाकी है।