Kunwar Kant
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Monday, January 25, 2010
मजबूरी...
एक बार फिर वही अहसास
पर अफसोस कि
तोड़ न पाया जिम्मेदारियों के पाश
लो आज फिर जलाता हुँ
होली और कर देता हूँ
स्वाहा तुम्हें भी
सदा के लिए
राख कर बिखेर देता हुँ
अतीत के गलियारों में
Thursday, January 21, 2010
इंसान....
इंसान
शहरों में
कमरों,केबिनों
में
बंद हो रहा
गाँवों में
खेत, खलिहानों में
अपनों से
मिलने
को
तरस रहा
चाहकर भी
ये तिलिस्म
न तोड़ पा रहा
पल-पल
निहायत
अ के ला
हो रहा
इंसान
Tuesday, January 19, 2010
स्वाद की खातिर...सेहत के बहानें
गर्दन काट दी
चमड़ी उधेड़ दी
उलाटा पलाटा
बोटी-बोटी काटा
और लगा दी
प्रदर्शनी
उसके जिस्म की
बोटियों की
आए खरीदार बहुतेरे
उसे करेजा चाहिए
आप गु्र्दा लिजिए
बचा-खुचा
कुत्तों को चुनने दिजिए
अंत में सबनें
अंगुलियों को चाटा
और कहा
बड़ा मजा आया
Wednesday, January 13, 2010
स्विच इट ऑफ....
उनके होनें का अहसास उतना प्रबल न हुआ होता अगर विभिन्न प्रकार के इन दूर संचार माध्यमों का इतना विभत्स प्रचार प्रसार न हुआ होता
।
Monday, January 11, 2010
My optional Russian students...
"Suicide is not the only way out if you are fed up of life and you don't want to live any more."
It is happening again.....
Monday, January 4, 2010
इल्जाम मेरे सिर....
एक अमानत
पहुँचा देना उनके घर तक
और खयानत,
दे रहा अब मेरे घर दस्तक
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